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अरबोरिकल्चर का महत्व


अरबोरिकल्चर का महत्व


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   आज हमारा देश तेजी से विकास कर रहा है। जल्दी ही हम विकासशील देश की श्रेणी से निकल कर विकसित देशों की पंक्ति में खड़े होने वाले है। जहां आज हमारे देश में हर गांव को शहरों को महानगरों से फोर लेन या सिक्स लेन वाली सड़कों द्वारा जोड़ा जा रहा है ताकि परिवहन को बढ़ावा दिया जा सके और समय की बचत की जा सके। आज सड़कें विकास का पर्याय बन चुकी हैं, ऐसा कहने से कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। बड़ी सड़कें जैसे फोर लेन एवं सिक्स लेन सड़कों का चलन काफी तेजी से बढ़ा है जिसके फलस्वरूप  किसानों की जमीनों का, चरागाह जमीनों, वनों की जमीनों का अधिकरण बढ़ा है। साथ ही पेड़ों की कटाई भी बढ़ी है जिसके चलते वन क्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में अरबोरिकल्चर (Arboriculture) का महत्व बढ़ जाता है। अरबोरिकल्चर का मतलब होता है वृक्षों की एवं झाड़ियों को रोपित करना, हस्तांतरित करना एवं उनकी देखभाल करना। साथ ही उनको सही तरीके से लगाना जिससे वृक्षों से छाया मिल सके और क्षेत्र की सुन्दरता को बढ़ाया जा सके। पहले लोग सफर करते थे मंजिल या तय मुकाम तक पहुंचने के लिए। परन्तु समय के साथ बदलाव भी आया है। कुछ लोग लांग ड्राईव (लम्बी दूरी) के लिए जाना पसंद करते हैं। अगर सड़के लम्बी चौड़ी, सुविधाजनक एंव हरियाली एवं फूलों की झाड़ियों से सुसज्जित हों तो सफर का आनन्द अलग ही आता है। आज के युग में यह भी एक मनोरंजन का एक साधन बन गया है। ऐसे में सड़कों के साथ अरबोरिकल्चर एवं लैडस्केपिंग की जरूरत महसूस की जाने लगी। इसके लिए इंडियन रोड कांग्रेस (IRC) की स्थापना की गई और उसके बाद तो अरबोरिकल्चर एवं पौधरोपण को सड़कों की गुणवत्ता के साथ जोड़ा जाने लगा और ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। इसके साथ ही एवेन्यू प्लांटेशन (एक पंक्ति/ दो पंक्तियों/तीन पंक्तियों में) रोपित करने का चलन बढ़ा है। पहली पंक्ति में छोटे झाड़ीनुमा पौधे 3-3 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं। दूसरी पंक्ति में मध्यम ऊंचाई वाले वृक्ष 6-6 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं। तीसरी पंक्ति में बड़े वृक्ष 12-12 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं। सड़क के मध्य में प्लान्टर बना कर झाड़ीनुमा पौधों जैसे कनेर, टिकोमा, विभिन्न रंगों वाली बोगनवेल इत्यादि पौधों को 3 मीटर की दूरी पर (एक पंक्ति/दो पंक्ति) क्रमबद्ध तरीके से लगाया जाता है जिसे मध्य वृक्षारोपण (Median Plantation) कहते है। इसमें एक ही किस्म के पौधे कम से कम 200 मीटर की दूरी तक लगाये जाने चाहिए। जैसे कि सफेद रंग, पीले रंग, लाल रंग, गुलाबी रंग वाली बोगनवेल, कनेर की प्रत्येक किस्मों का 200 मीटर की दूरी तक एक ही पट्टा होना चाहिए। मिडियन में पौधे लगाने से मुख्य रूप से कई लाभ होते हैं। पहला गाड़ियों के प्रकाश को यह सड़कों की दूसरी ओर जाने से रोकता है जिससे दूसरी ओर वाले वाहन चालक की आंखों में रोशनी नहीं पड़ती है और रात में दुर्घटना होने की आशंका कम हो जाती है। दूसरा यह जीवंत बाड़ बंदी काम भी करती है। तीसरा सड़क के सौन्दर्यीकरण में चार चांद लगाती है। यह धूल मिट्टी एवं वायु प्रदूषण को रोकने का कार्य भी करती है और जैसा कि हम सब जानते है कि वृक्षों एवं झाड़ियों को श्रृंखलावृत तरीके से लगा कर धूल मिट्टी एवं वायु प्रदूषण के तत्वों को रोका एवं अवशोषित किया जाता है। दिन प्रतिदिन वाहनों के आवागमन से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को भी यह काफी हद तक कम करते है।     

   सड़क के दोनों तरफ मिट्टी के ढलान पर आमतौर पर दूब घास लगाई जाती है जिससे वर्षा होने पर मिट्टी के कटाव को रोका जा सके। वृक्षों का चयन करने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखा जाता है जैसे कि जलवायु की अनुकुलता, बढवार की तीव्रता, कम रखरखाव की आवश्यकता, आर्थिक एवं सामाजिक लाभ, भविष्य में वृक्ष का आकार (फैलाव) एवं ऊंचाई, पत्तों एवं फूलों के रंग को ध्यान में रखकर, वृक्षों में होने वाले पतझड़ की ऋतु  को ध्यान में रखते हुए, मिट्टी एवं पानी की विद्युत चालकता (EC) एवं पीएच (PH) मानक की रीडिंग को देखते हुए (जैसे कि अम्लीय, क्षारीयता,) को देखते हुए वृक्षों का चयन किया जाता है। उदाहरण के लिए शुष्क एवं सूखे क्षेत्र दक्षिण हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य भारत के मैदानी क्षेत्रों में मुख्य रूप से नीम, पलास, अमलतास, शीशम, पीपल, बरगद, बकायन नीम, करंज, जामुन, इमली, काशीद, सप्तपर्नी, बुश, रोहिड़ा आस्ट्रेलियन बबूल इत्यादि प्रकार के पेड़ लगा सकते हैं। क्षारीय क्षेत्रों में आस्ट्रेलियन बबूल, करंज, इमली, अर्जुन, केजुराईना, काशीद, पार्किनसोनिया इत्यादि के पेड़ लगाये जा सकते हैं।  पेड़ लगाने के लिए सर्वे करना, क्षेत्र की साफ सफाई, खड्डे खोदना (मिडियन के लिए 2x2x2 फुट एवं ऐवन्यु के लिए 1x1x1 मीटर के खड्डे), बाड़ बंदी का सामान खरीदना ये सभी कार्य जनवरी से मार्च माह में कर लेने चाहिए। खड्डे भरने की सामग्री एकत्रित करना, खड्डे भरने का कार्य, वृक्षों को खरीदना एवं नर्सरी में रखना यह कार्य अप्रैल से जून माह तक कर लेने चाहिए। मिडियन के पौधों की ऊंचाई 3 फुट से ज्यादा होनी चाहिए। 

   वहीं ऐवन्यु के वृक्षों की ऊंचाई 6 फुट से ज्यादा होनी चाहिए और तने की मोटाई अंगूठे के आकार की होनी चाहिए। जुलाई अगस्त माह में वृक्षारोपण का कार्य कर देना चाहिए तथा दूब घास मानसून आने से पूर्व (मई -जून) माह में लगानी चाहिए। सभी रोपित पौधों का सितम्बर से लेकर मार्च तक रखरखाव कार्य जैसे कि घास निकालना, निराई गुड़ाई करना, कटाई छंटाई करना इत्यादि। मिडियन के पौधों की ऊंचाई 1.5 से 2 मीटर तक रखी जानी चाहिए। दूसरे वर्ष जुलाई अगस्त में कुल रोपित पौधों का 20 प्रतिशत संख्या मरणोपरांत बदली जाती हैं। चौथे वर्ष जुलाई अगस्त में कुल रोपित पौधों का 10 प्रतिशत संख्या मरणोपरांत बदली जाती हैं। हमारे देश में कटाई छंटाई मुख्य रूप से दिसम्बर से जनवरी एवं मई से जून माह तक की जाती है। मिडियन के पौधों में फूलों का खिलना मुख्य रुप से फरवरी से जून एवं सितम्बर से दिसम्बर तक रहता है। वैसे जरूरत पड़ने पर कटाई छंटाई कभी भी की जा सकती है। मिडियन में पौधे लगाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है पौधे कहां नहीं लगाने चाहिए, इसकी जानकारी होना आवश्यक है। मिडियन के जिस क्षेत्र में पौधें नहीं लगाये जाते हैं उसे वृक्षारोपण निषेधित क्षेत्र (नो प्लानटेंशन जोन) कहते हैं। उदाहरण के लिए मिडियन में रास्ता खुलना (मिडियन कट), ग्रेड सेपरेटर से कम से कम 5 मीटर की जगह पर कोई पौधा नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इससे ट्रैफिक का आवागमन दिखाई नहीं देता है जिससे दुर्घटना होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। मीडियन की चौड़ाई 1.5 मीटर से कम है तो उस पर सिर्फ दूब घास लगायें। 1.5 से 3 मीटर तक की चौड़ाई वाले मिडियन में एक पंक्ति में पौध लगायें। इस प्रकार लगभग 1 किलोमीटर लम्बाई वाले मिडियन में 333 पौधे आने चाहिए। इसी प्रकार से 4.5 से 5 मीटर की चौड़ाई वाली मिडियन में दो पंक्तियां झाड़ियों की लगायें। इसमें लगभग 1 किलोमीटर लम्बाई वाले मिडियन में 666 पौधे आने चाहिए। सड़कें विकास का पर्याय हैं परन्तु विकास के साथ पर्यावरण का ध्यान भी रखना महत्वपूर्ण है। ऐेसे में अरबोरिकल्चर का महत्व काफी बढ़ जाता है। साथ ही अरबोरिकल्चर विशेषज्ञ की मांग भी देश में तेजी से बढ़ रही है। इसके लिए कृषि स्नातक या बागवानी में स्नातक डिग्री के साथ कम से कम 5 वर्ष का प्रायोगिक अनुभव होना आवश्यक होता है। इस क्षेत्र में युवाओं के लिए असीम रोजगार की  सम्भावनाएं हैं। ऐसे में आज का युवा इस क्षेत्र से जुड़कर अरबोरिकल्चरिस्ट, अरबोरिकल्चर सलाहकार के रूप में कार्य कर 20 हजार से 80 हजार रुपये हर माह कमा सकता है। इसमें काम के साथ पैसा एवं कार्य संतुष्टि भी व्यक्ति को प्राप्त होती है।   


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